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Sri Sri Mishra

Others

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हे ! हिमनग..

हे ! हिमनग..

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हे! हिमनग तुम प्राणों के प्राण......

उच्च तुंग व्योम चिर गूढ़ तुम आख्यान....

अवनि ढल आएगा दिशि पलक समान.....

झूमेगा लघु पद चंचला केली विनोद....

फूट पड़ेंगे नव जलस्रोत प्रणय सा नवगान..

सिहर उठेगा स्वप्न विस्मय सा अम्लान..

खुल उठेगा भेद सौरभ का मृदु कच जाल......

हे ! हिमनग तुम प्राणों के प्राण.....

छटा सौंदर्य इंद्रधनुषी सी पट ढंग गात...

उज्जवल श्वेत मोतियों सा हिलता हिम हास..

कपोलों अरुण अधरों की हरित पर्ण पल्लव प्रात...

हृदय में खिल उठता ओम का झंकृत तार तत्काल...

तुम उस ओंकार की छवि का हो पूर्ण अनुमान...

हे ! हिमनग तुम प्राणों के प्राण..

शलभ चंचल सी मुग्ध मूर्ति लिपटी उषा समान..

भावुकता की ह्रदय में संस्कृति सी छविमान..

सरस मधुपों का हो तुम मुकुल मृदु श्रावण मधुमास..

गूंजे हर हर इस ओर से उस छोर पग पग अनहद नाद..

हे ! हिमनग तुम प्राणों के प्राण...


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