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Rishabh Tomar

Abstract


4.2  

Rishabh Tomar

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गजल

गजल

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दीप चाहत का ह्रदय में जलता रहा

लौं बुझाने को तूफ़ां मचलता रहा


पाक रिश्ते को नापाक करने यहाँ

दौर साजिश का यूँ रोज चलता रहा


काश खिड़की से झके वो बाहर यहाँ 

इसलिये छत पे मैं तो टहलता रहा


इश्क रोशन करें इस जहाँ को सदा

इसलिये मोम सा मैं पिघलता रहा


वो अलग बात है मैंने कुछ न कहा

पर ये दिल मेरा तुझपे धड़कता रहा


काश मिल जाये फिर मोड़ पे वो खड़ी

इसलिये मैं वहाँ से निकलता रहा


कसमें वादे वाफ इन हवालों को दे

बनके मौसम ऋषभ वो बदलता रहा।


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