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Paramita Sarangi

Abstract


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Paramita Sarangi

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गीत

गीत

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समय के साज पर

मेरा गीत जो

'अनसुना साज' कहलाता है,

उसे गाने के लिए कंठ नहीं

उसे जीने के लिए राह नहीं।

हे चाँद तू तो यूँ ही  

हँस रहा है

दूधिया बादलों की बाहों में।


मुझे नहीं मालूम खजुराहो के

उन शिल्पियों के नाम

जिन्होंने सिध्द किया है,

“रस की सच्ची धार तो

पत्थरों में ही प्रवाहित है”


खुली आँखों से सपना

 देखती नायिकाएँ 

उनके अंग हैं

वे किसी के संग हैं

फिर भी होंठों पे चुप्पी है


अनाम शिल्पी

गुमनाम नक्काश 

और अनजान चित्रकार

जिनके गीत तो हैं 

फिर भी गाये नहीं गए


रात अपने सौंदर्य को लेकर

ख़ामोश है, 

आकाश की आगोश में

चाँद तू हो न हो

मैंने छेनी को पंखुड़ी में

पत्थर को मेनका में

बदल दिया है और 

कल एक कविता लिखी है।


चाहे वह गूंज सके या नहीं

फिर भी सच्ची है

क्योंकि

मैंने उसे लिख दिया है।


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