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Surendra kumar singh

Abstract


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Surendra kumar singh

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एक भजपुरी गीत सूतल हवुवैं

एक भजपुरी गीत सूतल हवुवैं

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उदास से मौसम में सबके लिये

सूतल हवुवैं कि जागल हवुवैं

जानि न पँवली पिया कइसे हवुवैं।

सूतल जनतीं त पिया के जगवतीं

खींच के चदरिया सुरुजवा देखवतीं

जागल जनतीं त हँसि हँसी कहतीं

एतना भरमबा त लूटि जहिहैं धरती।

रुसल हवुवैं कि खेलत हवुवैं

जानि न पँवली पिया कैसे हवुवैं

रुसल जनतीं त पिया के मनवतीं

बारि के दियानवां अरतिया उतरतीं

खेलत जनतीं त सँगे सँगे खेलतीं

हथवा में हाथ लेके सँगे सँगे नचतीं।

मांगत हवुवैं कि बांटत हवुवैं

जानि न पवलीं पिया कइसे हवुवैं

मांगत जनतीं त खोलतीं केवड़िया

अपने पिया के लुटवंती तिजोरियां

बांटत जनतीं त बड़ा सुख पवुतीं

जेवन पिया देतें ओके लेके बिहंसतीं।

सूतल हवुवैं कि जागल हवुवैं

जानि न पँवली पिया कइसे हवुवैं।


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