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Nilofar Farooqui Tauseef

Abstract Tragedy Action


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Nilofar Farooqui Tauseef

Abstract Tragedy Action


दुर्भिती

दुर्भिती

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जब छोटी थी तो अक्सर अंधेरों से डरती थी।

अंधेरों से ज़्यादा, भूतों से डरती थी।


वक़्त के साथ परवान चढ़ती गयी।

बच्ची से फिर बड़ी हो गयी।


आज भी दुर्भिती वही है।

आज भी दुर्गति वही है।


फ़र्क़ सिर्फ़ इतना सा है।

हक़ीक़त भी लगता सपना सा है।


भूतों की जगह इन्सानों ने ले लिया।

इंसानों ने नहीं, हैवानों ने ले लिया।


डर के साये में आज भी जीती हूँ।

जब भी तन्हा कहीं निकलती हूँ।


बलात्कार का डर, दिल से जाता नहीं।

क्यों ऐसा समाज कोई बनाता नहीं ?


ये सिर्फ मेरी नहीं, बहुत लोगों की कहानी है।

समझों तो मोती है नहीं तो आँखों का पानी है।


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