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Satyendra Gupta

Abstract

4.5  

Satyendra Gupta

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दिल और दिमाग

दिल और दिमाग

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साहब ये जो दिल है,

भला काम करने पे है मुस्कुराता ,

बुरा काम करने पे है दुत्कारता ,

किसी का हित करने पे होता है खुश,

किसी का अहित करने पे होता है नाखुश,

फिर दिल की बात मानते क्यू नही ।


दिल तो सभी का है एक जैसा,

इसका कार्य भी है एक जैसा,

भाव अलग अलग रहते है सबके,

कोई दयालु है बन जाता,

कोई निर्दयी है बन जाता,


किसी में प्रेम का सागर है होता,

किसी में नफरत का भंडार है होता,

दिल को हम समझ पाते नही,

फिर दिल की बात मानते क्यू नही।


दिल बाजारों में बिकने वाली चीज है नही,

किसी से बदलने वाली चीज है नही,

ये तो मन के भावो से करती है कार्य,

दिमाग और दिल दोनो हो एक साथ,

ये दोनो जब बन जाए दोस्त,


दिमाग जब सुविचार पैदा करने लगे,

दिल जब उसका साथ देने लगे,

तब महान कार्य हो जाता है,

वैसा दिल और दिमाग वाला इंसान,

महान पुरुष कहलाता है,

महान पुरुष कहलाता है।


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