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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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धोखा और फरेब

धोखा और फरेब

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है क्या खेल जीवन का ये मालूम नहीं

जो हो रहा है गलत या है सही

हौसले बुलंद चाक चौबंद है

फिरभी लोगों को नफरतें क्यों पसंद है।


खुल के जी भी नहीं सकते

शौक ए ज़ाम पी भी नहीं सकते

हैं रंगों में धर्म के क्यूं रंगे हैं लोग

हैं आदमी लेकिन आदमी क्यूं नहीं बनें हैं लोग।


है हठधर्मिता फैली क्यों असहिसुन्नता

क्यों जात पात में बंट रहा समाज है।

क्यों बन रहा बिगड़ रहा मिजाज़ है।


हैं ये अजीब किस्से कौन किसके हिस्से

हैं ये सिलवटें करवटें बदलते परिवेश

ना जानें कीत भेष मिल जाए नरेश

बनके सर्वेश भर के कोई आवेश

ये वक्त बेवक्त बदलता हर देश है।


अपनी जरूरतों के हिसाब से..

सब चल रहा

है आदमी क्यों बदल रहा।

था जो हरा भरा

अब क्यूं उजड़ रहा।

है क्या देखते हो ऐ साहिब

ये ये सब तेरे हीं हैं मन माफिक

बस ऐतराज जाल धोखा फरेब है

है टटोल रहा ज़माना अब ज़ेब है।


नाचा रहा वक्त सभी को

पहन मुफलिसी की पाज़ेब है।

सिर्फ़ इश्क़ है धोखा है फ़रेब है।

सिर्फ़ इश्क़ है धोखा है फ़रेब है।


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