Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

Manisha Shaw

Abstract Others


4.6  

Manisha Shaw

Abstract Others


भईया और बहना

भईया और बहना

1 min 161 1 min 161

कहने को तो साल में एक दिन रक्षाबंधन का त्योहार आता है, 

मगर फूलों के जैसे यह प्यारा रिश्ता रोज घर को सजाता है। 

सुबह से शाम तक होती रहती है कई मीठी लड़ाईया,

खुद ही रुला कर, खुद भी रोने लगता है भईया। 

"देखो न माँ .. भईया मुझे डपट रहा है", 

"नहीं नहीं माँ! बहन झूठ बोलती है.. वो तो मुझे सता रही है।" 


भाई-बहन के इस आनाकानी में पूरा घर गूंज उठता है, 

रिश्तों के इस छोटे से बगिया में मानो भौंरा खिलखिलाता है। 

जब कभी बहन उदास किसी कोने में छुप जाती है, 

तब भईया 'जोकर' बन चेहरे पर मुस्कान ले आता है। 

बहन भी उस वक्त मर्म सी दुआ बन जाती है, 

जिस पहर भईया मुश्किलों के सामने खड़ा होता है। 


रूठने - मनाने में चाहे शाम गुजर जाता है, 

पर रूला दे कोई बहना को, यह भईया को रास नहीं आता है। 

भईया पर कोई और हक जताए तो बहन खीझ जाती है, 

पर हँसते - हँसते भईया को भाभी पर सौंप कर, खुद विदा हो जाती है। 

ये मजबूत धागा जो बहन अपनी भईया की कलाई पर बाँधती है, 

'प्रीत का प्रतीक' अपने भईया में ही तो देखती है। 

करता है वादा भईया भी और सदा बहन की रक्षा करता है, 

समझ कर बहन को बेटी अपनी, पिता का भी हक अदा करता है। 


            


Rate this content
Log in

More hindi poem from Manisha Shaw

Similar hindi poem from Abstract