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Author Harsh Ranjan

Others


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Author Harsh Ranjan

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भाषा

भाषा

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बस भाषा का ही फेर था,

कोई गुर्राया,

कोई चिल्लाया,

इंसानों का कहा, 

इंसानों की समझ आया।


मुझे लगा कि भाषा ही

भावनाओं की पतवार है

जो इंसानों को दुनिया में

एक किनारा देती है,

भाषा ही है जो घुप्प अंधेरे को

प्रकाश बन बेध देती है,

भाषा रोटी सी पहली जरूरत नहीं

लेकिन कुछ जरूरतें 

पूरी कर देती है।


जो भी मिला कड़वा मीठा

उसे स्वाद कर,

आँसू और हँसी को शब्द देती है।

मेरी माँ नहीं आया ही सही

मुझे पसंद नहीं कि वो

गैरों के बिस्तर पर लेटी है।


आज तो जिह्वा बेच आया हूँ

पर जब लौटकर घर आऊँगा

अपनी भाषा मे रोऊंगा, गाऊँगा

और संस्कृति को लक्ष्य कर

अपनी भाषा मे चिल्लाऊंगा।


अपनी संस्कृति के चरण रज को

अपनी जिह्वा से लगाऊंगा,

अपनी सोच के लिए शब्द खरीदने

कभी बाजार नहीं जाऊँगा।



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