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AJAY AMITABH SUMAN

Abstract Tragedy


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AJAY AMITABH SUMAN

Abstract Tragedy


बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के

बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के

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कोरोना बीमारी की दूसरी लहर ने पूरे देश में कहर बरपाने के साथ साथ भारतीय तंत्र की विफलता को जग जाहिर कर दिया है। चाहे केंद्र सरकार हो या की राज्य सरकारें, सारी की सारी एक दूसरे के उपर दोषारोपण में व्यस्त है। जनता की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव प्रचार हो गया है। दवाई, टीका, बेड आदि की कमी पूरे देश में खल रही है। प्रस्तुत है इन्हीं कुव्यथाओं पर आक्षेप करती हुई कविता "बैठे हैं चुप चाप जरा दिल को थाम के"


चुनाव में है करना प्रचार जरूरी,

ऑक्सीजन की ना बातें ना बेड मंजूरी,

दवा मिले ना मिलता टीका आराम से, 

बैठे हैं चुप चाप जरा दिल को थाम के,

आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।


खांसी किसी को आती तो ऐसा लगता है,

यम का है कोई दूत घर पे आ गरजता है,

छींक का वो ही असर है जो भूत नाम से, 

बैठे हैं चुप चाप जरा दिल को थाम के,

आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।


हाँ हाँ अभी तो उनसे कल बात हुई थी,

इनसे भी तो परसो ही मुलाकात हुई थी,

सिस्टम की बलि चढ़ गए थे बड़े काम के,

बैठे हैं चुप चाप जरा दिल को थाम के,

आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।


एम्बुलेंस की आवाज है दिन रात चल रही,

श्मशान में चिताओं की बाढ़ जल रही,

सहमा हुआ सा मन है आज राम नाम से,

बैठे हैं चुप चाप जरा दिल को थाम के,

आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।


भगवान अल्लाह गॉड सारे चुप खड़े हैं ,

बहुरुपिया कोरोना बड़े रूप धरे हैं ,

देवियाँ सब रह गयी है बस ही नाम के ,

बैठे हैं चुप चाप जरा दिल को थाम के,

आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।



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