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Alka Nigam

Romance


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Alka Nigam

Romance


बावरा बदरा झूमे

बावरा बदरा झूमे

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बावरा बदरा झूमे

कमल को बूंदें चूमें

भीजी ये धरती और गगन

पीहू पीहू पपीहा गाये

लाज उसको न आये

आतुर वो कैसे हो मिलन।


मिलन को मनवा तरसे

सजन भी दूर हैं घर से।

बूँदन की चोट से घायल

तन ये जरे

फिरूं मैं बहकी बहकी

सावन में दहकी दहकी

रैना मैं जाग बिताऊँ

नयनन में

चाँद भी मुझे टटोले

बोले वो हौले हौले

मुझको बना ले तू सजन


बावरा बदरा झूमे

कमल को बूंदें चूमें

भीजी ये धरती और गगन।

बिजुरिया चम चम चमके

सप्तरंग नभ पे बिखरें

झूलों पे लचके गोरे तन


देख के बैरी चँदा

मन ही मन मैं घबराऊँ

लौट के आएँ साजन

आस में दीप जलाऊँ।

आहट पाऊँ जो उनकी

गाऊँ मल्हार

भीजी पगड़ी साजन की

साँसों से अपनी सुखाऊँ

लाज से दोहरी हो मैं

चाँद से आँख चुराऊँ

देख दर्पण में खुद को 

जाऊँ लजा

मन का एकतारा बाजे

अंधियारा प्यारा लगे

नाचे मयूरा हो मगन।


बावरा बदरा झूमे

कमल को बूंदें चूमें

भीजी ये धरती और गगन।




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