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बाहर सपनों से निकले हम

बाहर सपनों से निकले हम

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गीत

बाहर सपनों से निकले हम

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बाहर सपनों से निकले हम,

फिर गाँवों की ओर चलें हम।

*

ये सपने माया ममता के,

गले घोटते हैं समता के।

क्यों जाएं फिर वहां छले हम,

फिर गाँवों की ओर चलें हम ।।

*

बड़े बड़े हम मकां छोड़कर,

खोली में आ गए दौड़कर ।

दडबों में दिन रात गले हम ,

फिर गाँवों की ओर चलें हम ।।

*

पांवों में छाले सबके हैं ,

खाने के लाले सबके हैं।

लगें काम पर शाम ढले हम, 

फिर गाँवों की ओर चलें हम।।

*

दुर्घटना बस एक घटना है।

देकर साक्ष किसे कटना है।।

क्यों डालेंगे हार गले हम?

फिर गाँवों की ओर चले हम ।।

*

दादा दादी नाना नानी,

साथ रखें तो हैं अज्ञानी।

गहरे थे पर अब उथले हम, 

फिर गाँवों की ओर चलें हम।।

*

कौन पड़ोसी किसका साथी ,

दीपक है "अनंत" बिन बाती।

पर हित में कब यार जले हम ,

फिर गाँवों की ओर चलें हम।।

***

अख्तर अली शाह "अनंत" नीमच


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