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Renuka Chugh Middha

Inspirational


4.0  

Renuka Chugh Middha

Inspirational


आस के दिये

आस के दिये

1 min 271 1 min 271

दिये सगं अपनी आने वाली ख़ुशियों की दुकान लगाये बैठा है, 

भूल कर अपना मासूम बचपन, ज़िम्मेदारी का बोझ उठाये बैठा है ! 


सपने तैर रहे है मासूम आखोँ में, ज़हन मे भूख उकुलाती है, 

कब बिकेंगे सब दिये, मन ही मन में चिन्ता कुलबुलाती है ! 


जमा होते है जब कुछ पैसे, मन ही मन हिसाब लगाता है , 

कितनी कमाई हुई, रूक-रूक कर जमा-जोड़ उगलियों पर गणित बनाता है ! 


कूट-पीस कर मिट्टी कड़ी मेहनत से, आस की आग में दीये पकाये हैं,

ख्याल बुने मन में बेचकर माटी के दिये अपनों के सपनों को ख़रीदना है ! 


गुहार लगाये आने-जाने वालों से ,ख़रीदो कुछ दिये चाहे कम क़ीमत ही दो, 

बेच इनको आयेगीं घर ख़ुशियाँ, फिर दिवाली हम भी मनायेंगे।


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