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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Romance

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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Romance

आखिर चाहते क्या हो

आखिर चाहते क्या हो

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आखिर चाहते क्या हो

यादों से भागे फिरते हो

आखिर चाहते क्या हो

सत्य स्वीकार मुक्त हो जाओ

तेरे लिए सूरज की तरह ढलता रहा हूँ


तेरे लिए तारा बन टिमटिमाता रहा हूँ

आवाज मत दो अजनबी सा

बेखुदी में डूबे इंसान से 

आखिर चाहते क्या हो

बुत बनाकर तारीफ के तीर चलाते हो

बिना किनारा छोड़े, बिना बंधन तोड़े

नदी से नई उम्मीद करते हो


यादों से भागे फिरते हो

आखिर चाहते क्या हो

दुर्वित पगडंडी की छुअन अभी ताजी है

पैरों पर पड़ी पायल की चुभन अभी ताजी है

तुम्हारी गमकती साँसों की स्पर्श अभी ताजी है

कहाँ से खरोचोगे कैसे मरोडोगे

यह कोई मोड़ नहीं जो छोड़ दो


जब भी खुद से मिलोगे, मुझसे भी मिलोगे

नही तोड़ना आसान आईना यादों का

यादों से भागे फिरते हो

आखिर चाहते क्या हो।।


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