आदर्श नारी
आदर्श नारी
कहां हूँ मैं ,वह आदर्श 'मैं'
खोज नहीं पाती
रिश्तों की भूल भुलैया मैं!
आदर्श बेटी....शायद नहीं मैं!
छोड़ कर घर अपना
एक नए परिवार की हो गई मैं!
मुड़ कर देखती,मगर जानती थी मैं!
नहीं प्रयोजन कोई अब
इस घर की ही होकर रह गई हूँ मैं!
आदर्श बहन...शायद नहीं मैं!
बचपन की वह प्यारी यादें
बन रह गईं यादें,क्या करती मैं !
आदर्श बहू... नहीं बन पाई मैं!
हर कोशिश रही नाकाम
इधर की न उधर की हो पाई मैं!
आदर्श पत्नी....कैसे बन पाती मैं!
कैसे वजूद को नकार देती
स्वीकार न कर पाई,पत्नी का ढांचा मैं !
आदर्श नारी.....कैसे बन जाती मैं!
ख़ामियाँ दिखा-दिखा कर तोड़ा
दुनिया ने,सिकुड़ कर रह जाती मैं!
आदर्श माँ..सवाल ही क्यों उठाऊँ मैं
जो हो न सकी किसी की
बच्चों की कैसे होगी ,समझ गई मैं!
परिपूर्णता की अपेक्षा ले डूबी मुझे
ख़ामियाँ हैं सहज,जानते हुए भी
किया दरकिनार यह सच,
जुटी रही ख़ुद को
'आदर्श नारी'
का ख़िताब दिलाने!
क्यों नहीं सोचा
'आदर्श'
बस शब्द है एक
न ढूँढे हम इसे इंसानों में
धोना पड़ेगा हाथ हर रिश्ते से
स्वीकारें ख़ुद को भी
औरों को भी
यही होगा आदर्श समाधान!
