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Mukesh Bissa

Abstract


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Mukesh Bissa

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आदमी

आदमी

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क्यों तकलीफों में है आदमी 

शामे ग़म की में है ज़िंदगी।


मुसीबते देने में लगे है लोग

दुश्मन से जूझ रहा आदमी।


खाने को दाना है आशियां में

घर में मुफलिसी में है आदमी।


जाड़े में पहनने को कपड़े नहीं

 भुखमरी में फंसा है आदमी।


हसरते पूरी हो कैसे

सारी कमी में है आदमी।


है बहुत लंबा सफर जीवन का

कब सपनों को साकार करेगा आदमी।


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