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Ritu Khatiwala

  Literary Colonel

नित ये अनुरागी मन तरसे

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निस दिन नैना राह निहारें, दिन अश्रु से बहते जाऐं मन की हिलोरें तुम्हें पुकारें घड़ी-घड़ी ये उठती जाऐं

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शिव के ब्याह की रात

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जाने कितनी बार गौरी को मनाया था  मुझे हठी बालक की तरह परे कर बैठी

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विभावरी में खिली कोंपल

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विभावरी में खिली कोंपल देख आसमान को, मुस्कुरा रही थी;

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क्षण क्षण में युग जी कर

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ज्ञान और ताप से अर्जित अहंकार, फिर बल, सत्ता और प्रभुत्व की आस, छोड़ गया रे तेरा विवेक तुझे, रावण, यह...

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एक अनुभूति

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एक अनुभूति, एक कल्पना, हर क्षण वही झंकार,

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इतना विशाल ह्रदय तुमने कहाँ से पाया मीरा?

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जो राणाजी तुम्हें सर्व सम्मति से ब्याह, डोली में बैठा कर घर ले आऐ, उनकी न तुम संगिनी बनी, न पटरानी...

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